| تَنَهَّدَ الرَّبيعُ مِلْءَ صدرِه |
| وأنَّتِ الجراح |
| فلفَّ بالصَّمتِ خفِيَّ سِرِّه |
| عن مُقلَةِ الصّباح |
| مناضلاً بروحِه عن كِبْرِه |
| مخضَّبَ الجَناح |
| الصَّبرُ يا ربيع! |
| * * * |
| الصَّبرُ يا ربيع! |
| شِيمةُ الكريم |
| والصَّمتُ يا ربيع! |
| شارةُ الحكيم |
| وأنتَ يا ربيعُ |
| بالأسى عظيم |
| * * * |
| ألا تَرى النّجوم |
| بسُهدِها تَرعاك؟ |
| والبدرَ كالمحوم |
| عطفاً على بَلواك؟ |
| والشَّمسَ في وُجوم |
| أسىً لِما أشجاك؟ |
| غداً تَلوحُ الشَّمس يا ربيع |
| ثَرّةَ الضِّياء |
| وتَسخَرُ الحقول بالصَّقيع |
| ساقطَ اللّواء |
| ويَستعيدُ أُفْقُكَ البديع |
| ألَقَ الهناء |
| ويتلاشى الحُلُم المُرِيع |
| في فرحة اللّقاء |
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| فارقُبْ حفيفَ الزَّهرِ في الغِيطان |
| إنّه اكتشاف |
| بِغَدِك الواعد |
| وانظر رفيقَ النَّهرِ في الغُدران |
| إنَه التِفَاف |
| بِبدنِكَ الصَّامد |
| واسمَع عَزيفَ الطَّيرِ في الوُديَان؟ |
| إنَّه هُتَاف |
| لمجدِك الصَّاعد |
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| عرشُكَ في القلوب |
| بِساطُه الحَنان |
| وتاجُك الحبيب |
| رابطةُ الوُجدان |
| وأنتَ يا ربيع |
| صانعُ العروش |
| ومبدعُ التّيجان |
| خالدةَ السّلطان |
| يا خالدَ الفتون |
| في الفنون |
| مُذْ وَدَّعَ الزَّمان |
| والمكان |
| فترةَ السُّكون |
| فانطَلَقَ البيان |
| وعَبَّر الكِيان |
| بقُدْرَة الفنّان |
| يا مُلهِبَ الخيال |
| بالحنين للكَمال |
| وفاتِحَ المَجَال |
| للقلوبِ، كي تَهِيم بالجَمال |
| وواهبَ الظّلال |
| فتنةَ الظّلال |
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| يا مُوقِظُ الحياةِ في الحقول |
| من سُباتِها |
| ومُطْلِقَ الشُّعورِ في النُّفوس |
| تَجتَلِي ذواتِها |
| وباعثَ الرُّؤَى تَرَقْرَقَ |
| الجمالُ في سِماتها |
| إليكَ من وِدادِنا |
| رسالةَ الإيمان |
| تَفيضُ من أكبادِنا |
| بأطهرِ الألحان |
| فأنتَ في جهادِنا |
| ذَخيرةُ الأمان |
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| لا يُخلِفُ الرَّبيعُ موعِدَ الإياب |
| ولا تُوارِي ضوءَه المأمولَ غَمرَةُ السَّحاب |
| ولن تَطولَ بالأماني وَحشةُ الغِياب |
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