| أنتِ؟ |
| ورانَ الشَّكُّ على نَفسي |
| ومَضيتُ أراجعُ أيامي |
| وأُهِيبُ بحَدْسي |
| فرأيتُكِ فيها ذِكرى |
| تَملأ أمسي |
| وتُوشَّي أحلامي |
| وتواكِبُ أوهامي |
| وتواسِي آلامي |
| وتُفَجِّعُ إلهامي |
| وترقِّقُ حسِّي |
| وتنيرُ الآفاق أمامي |
| وهَمَستُ.. |
| وكنتُ أرى في وَمضةِ عينيكِ |
| صَدَى الإحساسِ بِهَمسي |
| أنتِ؟ |
| ولكنْ كيفَ؟ وأينَ؟ |
| وتداعَتْ صُوَرُ الماضي |
| واختلجَت |
| فرأيتُكِ فيها رَأْيَ العينِ |
| وسمعتُ كلامَكِ فيها وكَلامي |
| ورفيفاً |
| يَصدُرُ عن كأسَينِ |
| عن كأسِكِ تَقْرَعُ كأسِي |
| وحفيفَ خُطاكِ |
| خُطاكِ، كما أسمعها الآن |
| تُبَدِّد صَمتَ الظُّلْمة |
| في أفقِ حياتي المبهَم |
| وتُرفرفُ في أجواءِ خيالِي |
| نغماً يتبسَّم |
| تتردَّدُ فيه، |
| حِجازاً.. |
| وصَباً
(1)
.. |
| أصواتٌ عُلْويَّة |
| تنضَحُ بالطِّيبِ |
| كسفحِ حِراءٍ وقُبَا
(2)
|
| أصواتٌ ما زالَ صَداها يَسري |
| ويَرُشُّ رمالَ الوادِي بالعِطرِ |
| * * * |