| ألا فاعلمي يا من أحبُّ صفاءها |
| بأنك مني مهجتي وعيوني |
| حلفت يميناً لا أخون مودتي |
| وإني أمينٌ لا أخون يميني |
| إذا جاء منك الصد جهراً وعنوةً |
| فعنديَ حزنٌ ما يزالُ معينيِ |
| وأصبرُ لا أُبدي انشغالاً ولوعةً |
| وأبدو شجاعاً ذاكَ بعضُ يقينيِ |
| وقد تنكري صوتي وصدق عواطفي |
| ولن تعلمي عن حيرتي وأنِيني |
| ولا أشتكي ذلاً وبعداً وحسرةً |
| وإنْ خالفَتْني في هواكِ شجوني |
| واجعل ما بيني وبينك خافياً |
| وأكتم في نفسي الأسى وحنيني |
| وأحمل آلامي وهمي ووحدتي |
| وأنزع عنّي هاجسي وظنوني |
| وحتى عذابي في هواك أحبه |
| يؤانسني في صحوتي وسكوني |
| يذكّرني هذا الغرامُ أحبتي |
| على أنهم بالهجر قد ظلموني |
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